बिहार

बिहार में नीतीश युग की समाप्ति की ओर: बड़े राजनीतिक उलटफेर की तैयारी, मुख्यमंत्री राज्यसभा जाएँगे…

 बिहार की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी हो चुकी है। दो दशक तक सत्ता के शिखर पर रहे नीतीश कुमार की भूमिका अब बदलने जा रही है। गुरुवार को उनके राज्यसभा के लिए नामांकन की तैयारी कर ली गई है।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और राष्ट्रीय लोकमोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के साथ नीतीश कुमार भी नामांकन दाखिल करेंगे। इस दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद रहेंगे।

बिहार नए अध्याय की दहलीज पर

राज्यसभा के लिए नीतीश का नामांकन करना केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि सियासत के एक युग के अंत की प्रस्तावना है। नामांकन के समय अमित शाह की मौजूदगी इस बदलाव को राष्ट्रीय आयाम देती है। यह संदेश भी देती है कि निर्णय केवल पटना तक सीमित नहीं है। बिहार नए अध्याय की दहलीज पर है। नीतीश कुमार की उपलब्धियां अब इतिहास का हिस्सा बनने की ओर अग्रसर है।

बता दें कि हाल ही में दैनिक जागरण ने निशांत कुमार की राजनीति में कदम रखने की खबर चलाई थी, जिसमें बताया गया था कि उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी भी मिल सकती है।

  • नीतीश कुमार को बिहार की राजनीति का पर्याय माना जाता है। 2005 में जब उन्होंने पहली बार मुख्यमंत्री पद संभाला, तब बिहार राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक जड़ता से जूझ रहा था।
  • 24 नवंबर 2005 की वह तारीख राज्य की दिशा बदलने के रूप में दर्ज हुई। सड़कों से लेकर कानून-व्यवस्था तक, शासन की शैली में बदलाव दिखा। गठबंधन बदले। समीकरण बदले।
  • लेकिन सत्ता का केंद्रीय चेहरा वही रहा। बीच में 2014 में एक संक्षिप्त विराम आया, जब उन्होंने पद छोड़ा और जीतनराम मांझी को आगे किया। परंतु वह विराम स्थायी नहीं था। वापसी हुई और फिर निरंतरता बनी रही। अब परिदृश्य अलग है।

राज्यसभा की ओर उनका कदम महज संसदीय विस्तार नहीं माना जा रहा। इसे योजनाबद्ध राजनीतिक संक्रमण के रूप में देखा जा रहा है। सबसे बड़ा प्रश्न है कि क्या राज्यसभा सदस्यता ग्रहण करने के साथ ही वे मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे? तकनीकी रूप से ऐसा कोई तात्कालिक दबाव नहीं।

राजनीति में समय का उपयोग

वर्तमान सदस्यों का कार्यकाल नौ अप्रैल तक शेष है। उसके बाद शपथ की प्रक्रिया पूरी होगी। तब नैतिक दबाव बढ़ेगा। लेकिन राजनीति में समय का उपयोग भी रणनीति होता है। माना जा रहा कि वह कुछ समय तक दोनों भूमिकाओं के बीच संतुलन साध सकते हैं। यह अंतराल ही उत्तराधिकारी तय करने का समय बनेगा।

राजनीतिक पूंजी का आकलन

भाजपा और जदयू के बीच नए मुख्यमंत्री को लेकर विमर्श शुरू हो चुका है। दोनों दल अपनी-अपनी राजनीतिक पूंजी का आकलन कर रहे हैं। जदयू के लिए यह अस्तित्व और नेतृत्व की निरंतरता का प्रश्न है। भाजपा के लिए यह अवसर और विस्तार की संभावना। इसलिए निर्णय केवल व्यक्ति का नहीं, समीकरणों का भी होगा।

इसी पृष्ठभूमि में नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार का नाम उभर रहा है। उन्हें भी जल्द ही सक्रिय राजनीति में प्रवेश करना है। उन्हें जदयू के भीतर नेतृत्व का सबसे बड़ा उत्तराधिकारी माना जा रहा है, लेकिन यह तभी संभव होगा जब दोनों बड़े दलों की सहमति बनेगी।

  • गुरुवार को एनडीए विधायकों की बैठक भी बुलाई गई है। इसे औपचारिकता भर नहीं माना जा सकता। यही वह मंच होगा, जहां से आगे के संकेतों को दिशा मिल सकती है। जाहिर है, यह केवल बिहार में सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है।
  • यह सत्ता संरचना के पुनर्संतुलन की प्रक्रिया भी है। नीतीश कुमार का दिल्ली की ओर जाना राज्य की राजनीति में रिक्ति पैदा करेगा। उस रिक्ति को कौन भरता है, यही आने वाले वर्षों की दिशा तय करेगा।

महागठबंधन अपनी ताकत आजमा सकता है

1. राज्यसभा की पांच सीटों का रिक्त होना इस बदलाव को और रोचक बनाता है। एनडीए के पास दो-दो सीटें भाजपा और जदयू के हिस्से में सुनिश्चित जा रही हैं।

2. पांचवीं सीट पर मुकाबला संभव है, जहां महागठबंधन अपनी ताकत आजमा सकता है। भाजपा की ओर से नितिन नवीन और शिवेश कुमार प्रत्याशी हैं।

3. जदयू की ओर से स्वयं नीतीश कुमार और केंद्रीय राज्यमंत्री रामनाथ ठाकुर मैदान में उतर रहे हैं। राष्ट्रीय लोकमोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा की दावेदारी समीकरणों को जटिल बनाती है।

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