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‘महिलाओं की भागीदारी से मजबूत होती है न्याय व्यवस्था’, सीजेआई सूर्यकांत ने की अहम टिप्पणी…

भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर जोर देते हुए कहा कि महिलाएं न्याय के लिए कोई अलग मानदंड नहीं लाती, लेकिन उनके जीवन के अनुभव न्यायिक दृष्टिकोण को अधिक व्यापक और संवेदनशील बनाते हैं।

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में महिलाओँ की बढ़ती भागीदारी से अदालतें समाज की वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से समझ पाती हैं और इससे न्याय व्यवस्था मजबूत होती है। सीजेआइ ने हाई कोर्ट कोलेजियम से अपील की है कि योग्य महिला अधिवक्ताओं को न्यायाधीश पद पर नियुक्ति के लिए प्राथमिकता से विचार किया जाए।

यह कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर दिल्ली में आयोजित किया गया था। उद्घाटन सत्र में सीजेआइ सूर्यकांत ने कहा कि एक समय ऐसा था जब औपनिवेशिक दौर में महिलाओं को वकालत करने की अनुमति तक नहीं थी। बावजूद पिछली एक सदी में महिलाओं ने अपने परिश्रम और प्रतिभा के बल पर कानून के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बनाई है।

फातिमा बीवी का उल्लेख किया

चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला न्यायाधीश फातिमा बीवी का उल्लेख करते हुए कहा कि 1989 में जस्टिस फातिमा बीवी ने कहा था कि मैने दरवाजा खोल दिया है। अब जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की है कि यह दरवाजा हमेशा खुला रहे और महिलाओँ की भागीदारी किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि तक सीमित न रहे, बल्कि संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा बने।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि कानूनी पेशे में कई बार महिलाओं को देर रात तक काम, पर्याप्त सुविधाओं की कमी और कार्यस्थल पर पक्षपात जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

इसके बावजूद बड़ी संख्या में महिला वकील इस पेशे में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायपालिका में महिलाओँ के प्रतिनिधित्व में सुधार के लिए केवल संस्थागत इरादा ही पर्याप्त नहीं है, इसके साथ ठोस कार्रवाई भी होनी चाहिए।

सीजेआई ने देश भर के उच्च न्यायालयों के कोलेजियम से न्यायिक नियुक्ति में योग्य महिला वकीलों पर सक्रिय रूप से विचार करने और जहां तक आवश्यक हो, विचार के दायरे को व्यापक बनाने का आग्रह किया। सम्मेलन की आयोजक वरिष्ठ वकील महालक्ष्मी पवनी और शोभा गुप्ता ने न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया।

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