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‘मुआवजे में देरी पर एम्प्लॉयर को जेब से भरना होगा पैसा’ सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला…

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम के तहत पेनल्टी की रकम एम्प्लॉयर को खुद चुकानी पड़ेगी, भले ही मुआवजा इंश्योरेंस से कवर हो। कोर्ट ने कहा कि यह कानून कर्मचारियों की भलाई के लिए बना है, इसलिए इसकी व्याख्या लाभार्थियों के हक में उदार तरीके से होनी चाहिए।

जस्टिस अरविंद कुमार और पी बी वराले की बेंच ने यह आदेश न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी की याचिका पर दिया, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी।

कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए जोर दिया कि इस कानून को कर्मचारियों के पक्ष में देखना चाहिए। सेक्शन 4A(3)(b) के तहत पेनल्टी की जिम्मेदारी पूरी तरह एम्प्लॉयर पर है।

कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट का वह आदेश रद कर दिया। इसमें कहा गया था कि देरी की पेनल्टी इंश्योरेंस कंपनी को चुकानी होगी।

बेंच ने कानून के पीछे के मकसद पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि यह एक सामाजिक कल्याण कानून है, जो संसद ने कर्मचारियों की शिकायतों को दूर करने के लिए बनाया। दुर्घटना होने पर कर्मचारी या उसके परिवार को जल्द से जल्द मुआवजा मिलना चाहिए, ताकि इलाज के खर्चे या परिवार की जीविका चल सके।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला फरवरी 2017 का है, जब एक कर्मचारी की अपने एम्प्लॉयर के वाहन चलाते हुए मौत हो गयी। मुआवजा न मिलने पर जुलाई में मृतक के परिवार ने लेबर कमिश्नर से गुहार लगाई। कमिश्नर ने 7.36 लाख रुपये का मुआवजा दिया, इसके साथ ही 12 फीसदी ब्याज और देरी के लिए 35 फीसदी पेनल्टी भी लगाई।

वाहन की वैध इंश्योरेंस पॉलिसी होने के कारण मुआवजा इंश्योरेंस कंपनी से वसूला जाना था, लेकिन पेनल्टी एम्प्लॉयर पर लगाई गई। हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि पेनल्टी भी इंश्योरेंस कंपनी को ही चुकानी होगी, न कि एम्प्लॉयर को।

हाई कोर्ट का फैसला पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस फैसले को पलटते हुए कहा कि 1995 में कानून में बदलाव किया गया था। इसमें पेनल्टी को मुआवजे और ब्याज से अलग कर दिया गया। इसका मकसद इंश्योरेंस कंपनियों पर बोझ कम करना था, क्योंकि पहले पेनल्टी भी उन्हें ही चुकानी पड़ती थी, जो उनकी जिम्मेदारी का हिस्सा नहीं थी।

कोर्ट ने बताया कि एम्प्लॉयर लोग मुआवजा और ब्याज समय पर नहीं देते थे, क्योंकि पेनल्टी भी इंश्योरेंस से चली जाती थी। इससे एक महीने की समय सीमा बेमानी हो गई थी और पेनल्टी का कोई डर नहीं रह गया था। अब इस फैसले से एम्प्लॉयरों पर दबाव बनेगा कि वे समय पर मुआवजा दें, ताकि कर्मचारी परिवारों को तुरंत मदद मिले।

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