युद्ध क्षेत्र के बाहर भी खतरा बन रही है जीपीएस जैमिंग, समुद्री यातायात हो गया धीमा; कितना पड़ेगा असर?…

ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमलों के 24 घंटों के भीतर, क्षेत्र के जलक्षेत्र में मौजूद जहाजों ने अपनी नेविगेशन प्रणालियों में गड़बड़ी का अनुभव किया।
उन्हें जहाजों के स्थान के बारे में भ्रामक संकेत मिलने लगे। यह स्थिति ग्लोबल पोजिशनिंग सेटेलाइट सिस्टम (जीपीएस) के संकेतों की जैमिंग और स्पूफिंग का परिणाम थी।
संघर्ष क्षेत्रों में सभी पक्षों द्वारा ड्रोन और मिसाइलों के मार्ग को बाधित करने के लिए इस प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है, जिसमें सेनाएं जानबूझकर नेविगेशन उपकरणों द्वारा उपयोग किए जाने वाले समान फ्रिक्वेंसी बैंड में उच्च-तीव्रता वाले रेडियो सिग्नल प्रसारित करती हैं।
जैमिंग से उपग्रह-आधारित स्थिति निर्धारण बाधित हो जाती है, जबकि स्पूफिंग के कारण गलत स्थान की जानकारी मिलती है। जैसे-जैसे इस युद्ध रणनीति का उपयोग बढ़ता जा रहा है, विशेषज्ञों को चिंता है कि इसके प्रभाव युद्धक्षेत्रों से कहीं अधिक दूर तक फैल सकते हैं।
ठप हो गया होर्मुज जलडमरूमध्य
शिपिंग खुफिया फर्म विंडवर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, 28 फरवरी को यूएई, कतर, ओमान और ईरान के जलक्षेत्र में 1,100 से अधिक वाणिज्यिक जहाजों के नेविगेशन सिस्टम इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप से प्रभावित हुए।
इस स्थिति के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाला समुद्री यातायात भी धीमा हो गया है। सटीक नेविगेशन के बिना इस महत्वपूर्ण जलमार्ग से यातायात लगभग ठप हो गया है।
जहाजों के टकराने का खतरा
कंपनी की वरिष्ठ समुद्री खुफिया विश्लेषक मिशेल वीज बाकमैन ने बताया कि इस स्थिति के कारण कुछ टैंकरों को अपना मार्ग बदलना पड़ा। या उनका संपर्क टूट गया।
संपर्क टूट जाने का मतलब है कि जहाज के ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (एआइएस) से आने वाले संकेत, जो जहाज की स्थिति, गति और घूमने की दर जैसी महत्वपूर्ण जानकारी प्रसारित करते हैं, अब प्रसारित नहीं कर पा रहे हैं, जिससे जहाजों के टकराने का खतरा बढ़ गया है।
विंडवर्ड ने ईरान युद्ध के पहले 24 घंटों में 21 नए क्लस्टर की पहचान की, जहां जहाजों के एआइएस को जाम किया गया। युद्ध की शुरुआत से तीन मार्च के बीच 655 जहाजों को प्रभावित करने वाली 1,735 जीपीएस हस्तक्षेप की घटनाओं को दर्ज किया गया, जिनमें से प्रत्येक आमतौर पर तीन से चार घंटे तक चलीं।
रूस-यूक्रेन युद्ध से बढ़ा चलन
वैश्विक नेविगेशन उपग्रह प्रणालियों (जीएनएसएस) में उपयोग किए जाने वाले संकेतों को जाम करना या उनमें गड़बड़ी करना कोई नई घटना नहीं है।
2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण के बाद से जहाजों और विमानों के लिए यह हस्तक्षेप एक बड़ी समस्या बन गया है। यह समस्या संघर्ष के निकट स्थित बाल्टिक सागर, काला सागर और मध्य पूर्व के कुछ हिस्सों में भी दर्ज की गई है।
ड्रोन हमलों से बचाव के लिए नेविगेशनल सिग्नलों को जाम करना और उनमें हेरफेर करना एक आसान और सीधा बचाव है। हालांकि, इससे उत्पन्न इलेक्ट्रानिक कोहरा उन वाणिज्यिक जहाजों के नेविगेशन सिस्टम को बाधित करता है जो संघर्ष में शामिल नहीं होते हैं।
विमानों के लिए खतरा
जून, 2025 में यूएई के तट पर दो तेल टैंकरों, एडलिन और फ्रंट ईगल के बीच हुई टक्कर में नेविगेशन सिस्टम में इलेक्ट्रानिक हस्तक्षेप को एक कारण माना गया था।
नेविगेशन सिस्टम में इलेक्ट्रानिक हस्तक्षेप प्रभावित क्षेत्रों में उड़ान भरने वाले विमानों के लिए भी खतरा है।
सितंबर में बुल्गारिया में उतरने की कोशिश कर रहीं यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वान डेर लेयेन को ले जा रहे एक विमान को जीपीएस नेविगेशन जैमिंग का सामना करना पड़ा था, जिससे पायलटों को कागजी नक्शों पर निर्भर रहना पड़ा था।
अंतरराष्ट्रीय हवाई परिवहन संघ (आइएटीए) के आंकड़ों के अनुसार, 2021 और 2024 के बीच विमानों को प्रभावित करने वाली जीपीएस सिग्नल हानि की घटनाओं में 220 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लोबल नेविगेशन सेटेलाइट सिस्टम के साथ छेड़छाड़ न होने का सुनहरा दौर अब समाप्त हो गया है। आधुनिक चमत्कार माने जाने वाली यह तकनीक अब एक चिंताजनक हथियार बनती जा रही है।





