वर्षों पुरानी परंपरा के चलते आज भी नहीं किया जाता होलिका दहन…

होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह पर्व मुख्य रूप से होली के एक दिन पहले मनाया जाता है। यह बुराइयों, नकारात्मकता और ईर्ष्या को त्यागने का प्रतीक है।
नई फसल के आगमन की खुशी भी इस पर्व से जुड़ी है। लोग होलिका की अग्नि में पुरानी बुराइयों को प्रतीक रूप में जलाकर नए जीवन की शुरुआत करते हैं।
आधुनिकता के इस दौर में आज भी देश-प्रदेश के कई हिस्सों में दैवीय प्रकोप, महामारी व मृत्यु के भय से होलिका दहन नहीं करते। इसी कड़ी में राजनांदगांव जिले से 24 किलोमीटर की दूरी घुमका के ग्राम पंचायत ग्राम सलोनी है।
इस गांव की आबादी लगभग 1300 से अधिक है। यहां वर्षों से होलिका दहन व रावण पुतला दहन नहीं किया जाता।
वर्तमान में इस गांव में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो होलिका दहन या रावण पुतला दहन देखा हो। गांव के सेवानिवृत प्राचार्य सुंदर सिंह मरकाम (85) ने बताया कि उनके पिता स्व. मदन सिंह मरकाम ख्याति तांत्रिक (बैगा) थे।
कहा था कि गांव में यदि होलिका दहन और रावण पुतला दहन किया गया तो भयंकर बीमारियां, माता का प्रकोप, दैवीय प्रकोप फैल जाएगा। इस प्रकोप से बचने के लिए बैगा ने गांव में होलिका दहन नहीं करने का शख्त निर्देश दिया था।
सरपंच नूतन यादव ने इसको पर्यावरण व समाज के अच्छा बताया। वर्षों से जारी इस परम्परा को चलते रहना चाहिए। इसी प्रकार गांव के युवाओं व बुजुर्गों का भी कहना है।
सेवानिवृत प्राचार्य मरकाम ने बताया कि राजनांदगांव के डॉ. गणेश खरे ने 1992- 93 में लिखित सलोनी के इतिहास में भी इस बात का वर्णन है।
गांव के किसी भी व्यक्ति की जानकारी में नहीं जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर की दूरी पर बसे ग्राम पंचायत ग्राम बघेरा की कहानी भी लगभग इसी प्रकार है।
यहां की आबादी लगभग 2700 है। इस गांव में लगभग 70 वर्ष पूर्व होलिका दहन हुआ था जो एक प्रयास था उसके पश्चात एक बार भी होली नहीं जली। वैसे वर्तमान में इस गांव के किसी भी व्यक्ति की जानकारी में नहीं है कि होलिका दहन हुआ था।
बुजुर्गों के मुताबिक एक बार गांव मे भयंकर महामारी व माता का प्रकोप फैला था तब ग्राम समाज ने बैगा आदि के निर्देश पर होलिका दहन करने पर पूरी तरह से रोक लगाया।





