छत्तीसगढ़

तेंदूपत्ता घोटाला: 6900 रुपए के बोरे 3000 में बेचे, 1600 करोड़ की एफडी ‘साफ’; 450 करोड़ के कर्ज में डूबा वनोपज संघ…

छत्तीसगढ़ के करीब 55 लाख आदिवासियों और ग्रामीणों की आजीविका का आधार ‘तेंदूपत्ता’ अब भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन की भेंट चढ़ रहा है। जिस वनोपज संघ के पास साल 2013-14 तक बैंकों में 1600 करोड़ रुपए की भारी-भरकम एफडी (फिक्स्ड डिपॉजिट) जमा थी, आज उसका खजाना पूरी तरह खाली हो चुका है। स्थिति इतनी खराब है कि संघ के पास अब अपने कर्मचारियों को वेतन देने और व्यापार चलाने तक के पैसे नहीं बचे हैं, जिसके कारण बैंकों से 450 करोड़ रुपए का कर्ज लेना पड़ा है।

भास्कर की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि इस वित्तीय संकट की मुख्य जड़ टेंडरों में होने वाली धांधली है। 2016-17 के बाद से हर साल टेंडर में ही कोई न कोई पेंच बताकर अलग-अलग इलाके के सैकड़ों लाट तेंदूपत्ता कम कीमत में बेचे जा रहे हैं। इस तरह हर साल करोड़ों का नुकसान होता रहा और नुकसान की भरपाई बैंकों में जमा एफडी से की जाती रही है। इस वजह से पिछले करीब 12 साल में पूरी एफडी ही खत्म हो गई, उल्टे संघ कर्ज में डूब गया है।

पिछले दो वर्षाओं के दौरान पहले 150 फिर 300 करोड़ का कर्ज लिया गया है। राज्य में तेंदूपत्ता के कुल 954 लाट (एक लाट में लगभग 1.5 लाख बोरे) तैयार किए जाते हैं। एक लाट की औसत कीमत लगभग 10 करोड़ होती है। सरकार आदिवासियों से 5500 रुपए प्रति बोरा की दर से पत्ता खरीदती है, जिसमें पैकेजिंग और अन्य खर्च मिलाकर प्रति बोरा लागत 6900 रुपए आती है।

धान के समर्थन मूल्य की तरह 5500 रुपए हर बोरे का संग्राहक को देती है सरकार तेंदूपत्ता संघ के माध्यम से तेंदूपत्ता खरीदी के लिए सरकार ने 5500 रुपए एक तरह से समर्थन मूल्य तय किया है। तेंदूपत्ता का संग्रहण करने वाले आदिवासी व ग्रामीण कितनी भी खराब गुणवत्ता का तेंदूपत्ता जमा करें, उन्हें प्रति बोरा 5500 रुपए दिए जाते हैं।

अंतर विभागीय समिति में मामला आया तो उठे सवाल, टेंडर निरस्त

तेंदूपत्ता के राज्य में 954 लाट बनते हैं। एक लाट की औसत कीमत लगभग 10 करोड़ होती है। एक लाट में लगभग डेढ़ लाख बोरे होते हैं। एक बोरे की खरीदी और पैकिंग में 6900 रुपए लागत आती है।

इस साल जनवरी में 954 में 429 लाट को बेचने के लिए ऑनलाइन टेंडर किए गए। इसी वर्षों कुछ बोरों को तो 12 हजार प्रति बोरे के हिसाब से बेचा गया, लेकिन कुछ को 3000 में यानी लागत के आधे से कम कीमत पर बेच दिया गया। 30 जनवरी को संघ की अंतर विभागीय समिति के समक्ष प्रस्तुत कर अनुमोदन करवा लिया गया।

इसी बीच संघ के उपाध्यक्ष यज्ञ दत्त शर्मा को बोरों की कम कीमतों पर शंका हुई। उन्होंने अफसरों से इस बारे में सवाल किया तो आनन-फानन में टेंडर की दरें निरस्त कर दी गईं। यहां तक कि वेबसाइट से भी रेट लिस्ट को हटा दिया गया। अगले ही दिन अंतर विभागीय समिति की दूसरी बैठक बुलाई गई।

इसमें वन मंत्री उपस्थित नहीं थे उनसे ऑन लाइन सहमति ली गई। इस बार केवल उन बोरों को बेचने की मंजूरी दी गई जिसकी कीमत 6300 तक आई थी। यानी कम कीमत पर जिन बोरों को बेचा जा रहा था, उन्हें बेचने की मंजूरी ही नहीं दी गई।

बोरों का औसत मूल्य 7800 बता करते रहे हैं खेल टेंडर के बाद प्रति बोरे की बिक्री औसतन 7800 रुपए दिखाकर हर साल खेल किया जा रहा है। संघ को प्रति बोरा लागत 6900 पड़ती है। अच्छी क्वालिटी का बोरा 12000 तक में बिकता है, जबकि निम्न क्वालिटी वाले बोरे को तीन-तीन हजार में बेच दिया जाता है।

निम्न क्वालिटी वाले बोरे की कीमत अंतर विभागीय समिति के सामने नहीं रखी जाती। अंतर विभागीय समिति में हालांकि वन मंत्री से लेकर सभी आला अफसर होते हैं उन्हें पर्दे के पीछे का खेल पता नहीं चल पाता है। उन्हें दिखाया जाता है कि प्रति बोरा 900 रुपए लाभ हो रहा है। जबकि कम कीमत में बिक्री से ही संघ को करोड़ों का नुकसान हो गया।

दूसरे-तीसरे टेंडर में पहले की तुलना में ज्यादा लाट बेचे गए सच्चाई सामने आने के बाद अब अमला अलर्ट हो गया। दूसरे और तीसरे टेंडर में भी 131 व 49 लाट बेचे गए लेकिन इस बार भी खराब क्वालिटी के तेंदूपत्ता 4500 प्रति बोरे के हिसाब से बिके, जबकि पहले टेंडर में ही 3000-3000 में बेचे जा रहे थे। अब संघ के पास 80 लाट बचे हैं। उनकी बिक्री के लिए चौथी बार टेंडर जारी किया जाएगा।

सीधी बात – अनिल साहू, एमडी राज्य लघु वनोपज संघ

संघ अचानक घाटे में कैसे चला गया? जवाब- कोरोना काल में बिक्री पर असर पड़ा था।

पर 1600 करोड़ की एफडी खत्म कैसे हो गई? जवाब- कई बार तेंदूपत्ता मौसम की मार से खराब होता है। रेट नहीं आते।

इस बार टेंडर में गड़बड़ी सामने आई है? जवाब- नहीं ये सामान्य प्रक्रिया है। हमने रेट का संशोधन कर दिया है।

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