अंत में हुआ आत्मसमर्पण: अपनी मौत की झूठी खबर फैला कर 20 साल तक Authorities को चकमा देता रहा पापा राव, ताकि उसकी खोज न हो सके…

बस्तर के घने जंगलों में दशकों तक सुरक्षाबलों के लिए ‘मौत का साया’ रहा कुख्यात नक्सली लीडर पापा राव आखिरकार सरेंडर करने जा रहा है। जगदलपुर से सुकमा और बीजापुर तक फैले लाल आतंक के इस बड़े चेहरे का हथियार डालना केवल आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि बस्तर में नक्सलवाद के लंबे और खौफनाक अध्याय का अंत माना जा रहा है। दरअसल, पापा राव की सबसे बड़ी ताकत उसकी बंदूक नहीं, बल्कि उसका दिमाग था।
पिछले करीब 20 सालों तक उसने खुद की मौत की ऐसी-ऐसी कहानियां गढ़ी कि सुरक्षाबल भी कई बार गुमराह हो गए। कभी खबर उड़ती कि जंगल में सांप के काटने से उसकी मौत हो गई, तो कभी यह अफवाह फैलाई जाती कि वह किडनी की बीमारी या मलेरिया से मर चुका है।
जांच में सामने आया कि इन अफवाहों का मास्टरमाइंड खुद पापा राव ही था, जो चाहता था कि फोर्स उसकी तलाश बंद कर दे। वह अदृश्य रहकर संगठन को मजबूत करता रहे। बस्तर में नक्सल नेटवर्क को जड़ से फैलाने में उसकी भूमिका बेहद अहम रही।
उसने सुकमा और बीजापुर के दुर्गम इलाकों में न केवल संगठन की नींव मजबूत की, बल्कि जनताना सरकार के नाम पर समानांतर सिस्टम खड़ा किया। नए कैडरों को ट्रेनिंग दी।
नक्सलवाद का पूरा ब्लू प्रिंट राव के पास पापा राव का सरेंडर करना पुलिस के लिए नक्सलियों का पूरा इंटेलिजेंस हाथ लगने जैसा है। उसके पास संगठन के वित्तीय साम्राज्य, शहरी नेटवर्क और आने वाले सालों के ब्लूप्रिंट की पूरी जानकारी है।
पुलिस को उम्मीद है कि पापा राव के खुलासों से कई सफेदपोश मददगारों के चेहरे बेनकाब होंगे।
सुकमा-बीजापुर के जंगलों में छिपे अन्य बड़े कैडरों तक पहुंचने का रास्ता साफ होगा। पापा राव का सरेंडर होना उस खौफ का अंत है, जिसने बस्तर की एक पूरी पीढ़ी को शिक्षा और विकास से दूर रखा। अब बस्तर के उन इलाकों में नई सुबह की उम्मीद जागी है जहां कभी सिर्फ बारूद की गंध हुआ करती थी।
जानिए कब-क्या अफवाह उड़ाई… जुलाई 2016: सुकमा से खबर आई कि सांप काटने से कमांडर पापा राव की मौत हो गई है। मई 2020: नक्सल लीडर पापा राव की किडनी फेल होने से मौत की खबर सामने आई थी। जनवरी 2026: बीजापुर में मुठभेड़ के दौरान भी पापा राव के मारे जाने की जानकारी आई।
इन गतिविधियों का मास्टरमाइंड था पापा राव… दक्षिण बस्तर में कई बड़े नक्सली हमलों की साजिश और संचालन में भूमिका {सुरक्षा बलों पर घात लगाकर किए गए हमलों में शामिल {सड़क निर्माण और विकास कार्यों को बाधित करने की गतिविधियां {ग्रामीण इलाकों में माओवादी नेटवर्क विस्तार और भर्ती अभियान {हथियार और रसद सप्लाई चैन को संचालित करने में भूमिका
कभी 30-35 हथियारबंद लड़ाके साथ होते थे, अब आधे बाकी पापा राव स्टेट जोनल कमेटी का सदस्य और पश्चिम बस्तर डिवीजन का प्रभारी था। कभी उसके साथ 30-35 हथियारबंद कैडर हुआ करते थे, लेकिन हाल के दिनों में यह संख्या घटकर आधी ही रह गई थी।
सूत्रों के मुताबिक आत्मसमर्पण से पहले वह इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान के दुर्गम इलाकों में छिपा हुआ था, जो लंबे समय से माओवादियों का गढ़ माना जाता है। पापा राव को इलाके में सुनाम चंद्रैया, मंगू दादा और चंद्रन्ना के नाम से भी जाना जाता था।
अब केशा ही आखिरी बड़ा चेहरा, 2 महीने से गायब सुकमा जिले का इनामी नक्सली सोढ़ी केशा अब भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती है। पापा राव के बाद अब बटालियन स्तर पर वही एकमात्र बड़ा नक्सली चेहरा बचा है। सुकमा जिले में ऐंटापाड़ गांव का रहने वाला केशा 25 लाख रुपए का इनामी है।
उसके साथ अब भी 25 से 30 सशस्त्र नक्सलियों के होने की सूचना है। हिड़मा के मारे जाने तक वह जगरगुंडा क्षेत्र में सक्रिय था, लेकिन उसके बाद लगातार लोकेशन बदल रहा है। बताते हैं कि दो महीने पहले तक उसकी मौजूदगी जगरगुंडा के अलग-अलग जंगलों में ट्रेस की जा रही थी, लेकिन अब पुलिस के पास भी उसकी सटीक लोकेशन नहीं है।
सुरक्षा एजेंसियां उसके तेलंगाना की ओर भागने की आशंका जता रही हैं। हिड़मा, बारसे देवा और पापा राव जैसे बड़े नक्सलियों की गैर मौजूदगी में अब केशा ही बटालियन स्तर पर संगठन की कमान संभाले हुए है। उसकी टीम के पास एके-47 और इंसास जैसे अत्याधुनिक हथियार हैं।





